सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

आयुर्वेद लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Ayurvedic massage,आयुर्वेदिक मालिश (अभ्यंग ) Massage

                   MASSAGE,M मालिश                                मालिश की विधि                               मालिश के  लाभ आयुर्वेदिक शास्त्र में स्वास्थ्य निर्माण के लिए 'मालिश' (अभ्यंग) एक अत्यंत उपयोगी विधि मानी जाती है। शास्त्रों में इसे अभ्यंग की संज्ञा दी गई है। मालिश एक विशेष प्रकार की चिकित्सा उपचार एवं स्वास्थ्य संवर्धन प्रयोग विधि है जिससे शरीर को निरोग व बलिष्ठ बनाया जा सकता है। अभ्यंग से स्वस्थ जीवन जीने के लिए ऐसे ही मदद मिलती है जैसी आहार, विश्राम, उपवास, व टहलने आदि से मिलती है। मालिश एक ऐसी कला है जिससे शरीर के संपूर्ण अवयवों में रक्त अभिसरण की क्रिया तेजी से संपन्न होती है। जिन स्थानों में रक्त जमा हुआ होता है या हल्कि गुत्धिया पड़ जाती है, उसे पिघला कर पतला बनाने का काम मालिश से आसानी से पूरा हो जाता है। इससे रक्तवाहिनी नाड़ियों को विवश होकर कार्य में तेजी...

आयुर्वेदिक शास्त्र के अनुसार षट्कर्म,षट्कर्म क्रियाएं क्या होती है,

                            षट्कर्म  आयुर्वेद शास्त्र में शरीर को स्वस्थ रखने हेतु  जिस प्रकार औषधियों का सेवन कराया जाता है उसके साथ साथ आहार-विहार शारीरिक व्यायाम आदि पर भी जोर दिया जाता है। रोग उपचार  के लिए 'षट्कर्म',  क्रियाओं के द्वारा शरीर शोधन की क्रियाओं के अभ्यास भी किए जाते हैं ।परंतु इन क्रियाओं को किसी योग्य गुरु के संरक्षण में किया जाना चाहिए।  षट्कर्म का मुख्य उद्देश्य शरीर की बल और स्थिति को ध्यान में रखते हुए शरीर को शोधन करना अर्थात शरीर का शुद्धिकरण करना होता है।  । षट्कर्म की क्रियाएं स्थूल शरीर को शुद्ध करती हुई सूक्ष्म शरीर के शुद्धिकरण में अत्यंत सहायक हैं ।इन क्रियाओं के अभ्यास से कफज विकार, वातज विकार ,पितज विकार अर्थात त्रिदोष वात पित्त कफ की विषम अवस्था को सम अवस्था में लाया जाता है। कुष्ठ रोग, उदर रोग, फुफ्फुस विकार हृदय एवं वृक्क की विकृतियां दूर होती हैं। यह षट्कर्म क्रियाएं छः प्रकार की होती है जो इस प्रकार हैं -- (1) नेति :--  इस क्रिया का ...

पंचकर्म ,आयुर्वेद में पंचकर्म चिकित्सा, पंचकर्म चिकित्सा क्या होती है,

                 पंचकर्म चिकित्सा आयुर्वेदिक चिकित्सा शास्त्र में पंचकर्म चिकित्सा प्रणाली के बारे में बताया गया है। रोगों से बचाव है उनके उन्मूलन के लिए पंचकर्म चिकित्सा आयुर्वेद चिकित्सा का एक  अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। पंचकर्म शब्द से ही इसका अर्थ स्पष्ट है कि यह पांच प्रकार के विशेष कर्म है। यह शरीर में मल और दोषो को बाहर निकालते हैं। क्योंकि कई बार अनेक प्रकार की औषधियों का सेवन करने पर भी रोग बार बार आक्रमण करते रहते हैं। इन रोगों से बचाव व इनके उन्मूलन के लिए शरीर के मल व  दोषों को बाहर निकालने वाली जो संशोधन की चिकित्सा प्रक्रिया है उसे ही पंचकर्म चिकित्सा कहा जाता है। पंचकर्म चिकित्सा से पूर्व कर्मों को किया जाता है उन्हें पूर्व कर्म कहा जाता है । पूर्व कर्म के अंतर्गत संशमन एवं संशोधन चिकित्सा की जाती है, उसमें स्नेहन और स्वेदन  का विशेष महत्व है। यह पांच कर्म निम्नलिखित हैं। (1) वमन ( Ametic therapy) (2) विरेचन ( puractive therapy) (3) नस्य     ( Inhalation therapy or Errhine) (4) अनुवास...

आयुर्वेदिक शास्त्र के अनुसार ,वात, पित्त, कफ त्रिदोष क्या है, शरीर में वात पित्त कफ की स्थिति

ईश्वर ने हमारा शरीर पंचमहाभूत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से निर्मित किया है। हमारा शरीर ईश्वर की अद्भुत सृजन कला का एक उत्कृष्ट नमूना है। जिसकी रूपरेखा अधिक से अधिक शक्ति गतिशीलता प्रदान करने के उद्देश्य को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। पंचतत्व से ही शरीर की उत्पत्ति होती है और मृत्यु के पश्चात इन्हीं पांच तत्वों में हमारा शरीर विलीन हो जाता है । जन्म और मृत्यु के बीच यात्रा काल को ही जीवन की संज्ञा दी गई है। आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार इन पंच महा भूतों के कार्य निर्माण समूह में सहयोगी रूप से शरीर के लिए काम करने वाले त्रिधातु वात ,पित्त ,कफ सलग्न रहते हैं। वात, पित्त, कफ केवल त्रिदोष ही नहीं बल्कि यह शरीर में विधमान तीन धातु भी है बल्कि यूं कहें कि हमारे शरीर की तीन शक्तियां है जो शरीर को सुचारू रूप से चलाने के लिए  प्रतिबद्ध है ।                           आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में वात, पित्त, कफ को मूल आधार माना जाता है और शरीर में विद्यमान इनकी स्थिति का मूल्यांकन करके ही चिकित्सा आरंभ की जाती है।...

आयुर्वेद में औषधि के साथ आहार का महत्व, आहार कैसा करें, रोगी का आहार

आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में मनुष्य के जीवन में औषधि के साथ उसके आहार को बहुत महत्व दिया गया है। रोगी की चिकित्सा करने के लिए औषधि के साथ साथ   उस को दिए जाने वाला आहार  से संबंधित  ज्ञान का होना अति आवश्यक  माना जाता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक तत्वों का आहार में होना आवश्यक माना जाता है।                      हमारे उपनिषदों में अन्न को ब्रह्म की संज्ञा दी गई है। आहार को युक्तिसंगत बनाकर और उसके विज्ञान को जानकर हम अनेकों व्याधियों की चिकित्सा कर सकते हैं। हम जो आहार सेवन करते हैं उसका प्रभाव केवल हमारे शरीर पर ही नहीं बल्कि हमारे मन पर भी पड़ता है। इसलिए कहा गया है कि "जैसा खाए अन्न वैसा होए मन" ।आहार से हमारे मन की प्रवृत्तियों का पोषण होता है और हमारी इंद्रियां पुष्ट  होती है और हमारे प्राणों को बल मिलता है। आयुर्वेद के अनुसार आहार हमें अपने शरीर की प्रकृति के अनुसार ग्रहण करना चाहिए । संतुलित आहार ही मनुष्य के स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहयोगी होता है। इस प्रकार पथ्य और उचित आहार...

आयुर्वेदिक चिकित्सा का सिद्धांत

आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में केवल मनुष्य को हुए रोगों के लक्षणों के आधार पर ही नहीं बल्कि उनके साथ-साथ रोगी की आत्मा ,मन, शारीरिक प्रकृति वात, पित्त, कफ आदि धातु की स्थिति को ध्यान में रखकर रोगी की चिकित्सा करता है ।  यह पद्धति  त्रिधातु वात, पित्त ,कफ के सिद्धांत पर काम करती है जब मनुष्य के शरीर में वात, पित्त ,कफ सम अवस्था में होते हैं तो मनुष्य स्वस्थ रहता है तथा यह जब विषम अवस्था में हो जाते हैं तो शरीर अस्वस्थ माना जाता है। मनुष्य का जीवन मे स्वास्थ्य याअस्वास्थ्य वात पित्त कफ की अवस्था पर ही निर्भर करता है। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का उद्देश्य वात पित्त कफ को समअवस्था में रखकर मनुष्य को स्वस्थ रखना है ।इसलिए आयुर्वेद लाक्ष्णिक नहीं संस्थानिक चिकित्सा पद्धति है। ।आयुर्वेद में प्रयुक्त होने वाली प्रत्येक औषधि रसायन का रूप है ।रोग प्रतिरोधक औषधिया एवं व्यक्ति आहार का विस्तृत विवरण विश्व को आयुर्वेद की ही देन है ।रोगों से बचाव के लिए ऋषियों ने अनेक बातों पर ध्यान दिया है आयुर्वेद के अनुसार कोई भी रोग केवल शारीरिक या मानसिक नहीं होता ।शारीरिक रोगों का कुप्रभाव मन पर तो ...

आधुनिक युग में आयुर्वेदिक चिकित्सा कीआवश्यकता, आज के युग में आयुर्वेद का महत्व,

आधुनिक युग में आयुर्वेदिक चिकित्सा कीआवश्यकता आज के आधुनिक युग में रोगी को स्वस्थ करने के लिए एलोपैथी  चिकित्सा पद्धती पूरे  विश्व में प्रयोग मे लाई जा रही है। परंतु अब धीरे-धीरे इस चिकित्सा प्रणाली ने मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए नई चुनौतियों को जन्म दे दिया है। जब किसी रोगी को  बीमारी से निजात देने के लिए एलोपैथिक की दवाई दी जाती है तो कुछ समय बाद उस दवाई से उसके शरीर पर कई  प्रकार के दुष्प्रभाव देखे जाते हैं इस प्रकार रोगी पर हुए दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए एक नई दवाई दी जाती है और इस प्रकार  दवाइयों की कंपनियों का बाजार गर्म रहता है। यद्यपि इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति में मनुष्य की चिकित्सा को लेकर नए नए शोध किए गए हैं। और चिकित्सा को लेकर वैज्ञानिक तकनीक का उपयोग कर नए प्रयास किए गए हैं। परंतु इसके बावजूद भी मनुष्य के स्वास्थ्य को लेकर हमें नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।                                          ...

वर्तमान समय में आयुर्वेद का स्वरूप और महत्व, भारत में आयुर्वेद के राष्ट्रीय स्तर के संस्थान

वर्तमान समय में आयुर्वेद का स्वरूप और महत्व आज आधुनिक युग में आयुर्वेदिक शिक्षा पद्धति को विश्व  स्तर पर अपनाया जा रहा है । यद्यपि यह भारतवर्ष की प्राचीन चिकित्सा पद्धति है । अभी कुछ दिन पहले ही भारत सरकार ने आयुष मंत्रालय की स्थापना की है जिसमें आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति को प्रोत्साहन  देने का प्रयास किया गया है। मं त्रालय ने 7 से 9 नवम्बर 2014 को नई दिल्ली में छठे विश्व आयुर्वेद  सम्मेलन का आयोजन किया,  जिसमें देश और विदेश से लगभग 4000 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसका उद्घाटन माननीय लोक सभा अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन द्वारा किया गया और इसके समापन समारोह को माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संबोधित किया।   छठे विश्व आयुर्वेद कांग्रेस के अवसर पर मंत्रालय ने अपने सहयोगी भागीदार विश्व आयुर्वेद फाउंडेशन के माध्यम से दिल्ली में राष्ट्रीय स्तरीय आरोग्य एक्सपो (6-9 नवम्बर के 2014) का आयोजन भी किया। वर्तमान समय में सरकार ने आयुर्वेदिक चिकित्सा के विकास लेकर अपनी नीतियों को स्पष्ट किया।                   ...

Ayurved • आयुर्वेद

                           आयुर्वेद (Ayurved in Hindi) श्री गणेशाय नमः   आयुर्वेद शास्त्र भारतीय ग्रंथो की परंपरा में प्राचीनतम चिकित्सा सिद्धांत का ज्ञान  माना जाता है। आयुर्वेद शास्त्र को विद्वानों ने उपवेद की संज्ञा दी है। भारतवर्ष के सबसे प्राचीन ग्रंथ वेदों से ही इसका प्रादुर्भाव हुआ माना जाता है। जिसके  विषय में अनेक  ऋषियों, आयुर्वेदाचार्यो और विद्वानों ने अपने अपने मतानुसार आयुर्वेदिक ग्रंथों की रचना करके मानव जाति को कृतार्थ किया है। भारतवर्ष के महान ऋषियों ने  अपना ज्ञान प्रदान करके मानव जाति पर बहुत बड़ा उपकार किया है।  इन महात्माओं को हम  शत-शत नमन करते हैं। भूमिका :- आयुर्वेद के विषय में भारतवर्ष के सबसे प्राचीन धार्मिक ग्रंथ वेदों में विवरण दिया गया है।  वर्तमान समय में उपलब्ध  प्राचीनतम ग्रंथ चरक संहिता, भेल संहिता और सुश्रुत संहिता आदि प्रचलन में हैं । इनमें  से चरक संहिता कायाचिकित्सा प्रधान तंत्र है और सुश्रुत शल्यचिकित्सा प्रधान हमको ...