घृतकुमारी ALOEVERA
(Aloevera Benefits in Hindi)
घृतकुमारी एक औषधीय वनस्पति है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में धृत कुमारी के औषधीय गुणो की महिमा का बहुत वर्णन किया है। इसका विधि पूर्वक सेवन करने से एक स्वस्थ व्यक्ति अपने स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए निरोगी जीवन व्यतीत कर सकता है तथा दूसरी ओर यदि कोई रोगी व्यक्ति रोगानुसार विधि पूर्वक इसका सेवन करें तो वह स्वास्थ्य प्राप्त कर सकता हैं। इसका पौधा भारत में सर्वत्र पाया जाता है। औषधीय गुणों के साथ साथ सुंदर दिखने की वजह से कुछ लोग इसे गमलों में लगाकर अपने घरों में रखते है। इसमें कांड नहीं होता जड़ के ऊपर से ही चारों तरफ मासल गुद्दे से परिपूर्ण एक से दो इंच मोटे होते हैं। इसके पत्तों को काटने पर पीताम वर्ण का पिच्छिल द्रव्य निकलता है। जो ठंडा होने पर जम जाता है, जिसे कुमारी सार कहते हैं। वर्तमान समय में अनेक आयुर्वेदिक औषधियों में इसका प्रयोग किया जाता है। इसकी अधिक डिमांड होने की वजह से भारतवर्ष में व्यापक रूप से इसकी खेती की जाती है। शुष्क भूमि में भी इसकी खेती आसानी से हो जाती है। इसकी खेती में अधिक जल की आवश्यकता नहीं होती इसलिए राजस्थान जैसे स्थानों पर इसकी खेती आसानी से की जाती है। भारत के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी इसकी अच्छी मांग है इसलिए भारत सरकार ने इसकी खेती को प्रोत्साहन देने के लिए किसानों से जुड़ी संस्थाओं को अनुदान देने का प्रावधान किया है।
घृतकुमारी के अन्य नाम
वैज्ञानिक नाम Aloe vera (L.) Burm. F.
कुल नाम Lilliaceae
अंग्रेजी नाम lndian aloe
संस्कृत घृतकुमारिका, गृह कन्या, स्थूलदला
हिंदी घी कुआर, ग्वारपाठा
गुजराती कुबाँर
मराठी कोरफड़
बंगाली घृतकुमारी
पंजाबी कुंवार गंदल
तेलुगु कलबद॔
द्राविड़ी कतालै
कन्नड़ तौलसरै, लोलिसार
अरबी सबरित
फारसी दरख्ते सिब्र
घृतकुमारी में 94% जल तथा शेष 6% भाग में 20 प्रकार के अमीनो एसिड, कार्बोहाइड्रेट एवं अन्य प्रकार के रासायनिक घटक पाए जाते हैं। इसमें मुख्य क्रियाशील तत्व 'एलोइन' नामक ग्लूकोसाइड समूह पाया जाता है, इसका मुख्य घटक बारबेलोइन है। एलोइन त्वचा पर एक सुरक्षा परत का निर्माण करता है जो त्चचा को हानिकारक पराबैंगनी विकिरण से रक्षा करती है। इसी गुण के कारण इसका प्रयोग सौंदर्य प्रसाधन सामग्री निर्माण में किया जाता है।
यह पचने में भारी, स्निग्ध,पिच्छिल,कटु , शीतल और विपाक मे तिक्त है। घृतकुमारी शीतल और दस्तावर है। नेत्रों के लिए हितकारी तथा वीर्यवर्धक,बलकारक है। यह पुष्टि कारक और रसायन है। यह बात गुल्म, पीलिया, कामला, उदर विकार, यकृत( (liver) रोग नाशक है। यह वात और पित्त के दोषों का संहारक है। यह रुधिर अधिकार तथा त्वचा संबंधी रोगों में लाभदायक है। यह औरतों के लिए हितकर है तथा गर्भाशय संबंधित विकारों में लाभदायक है। यह विरेचक है तथा कृमिघ्न है। यह कई प्रकार के औषधीय गुणों से भरपूर है।
मधुमेह रोग में धृतकुमारी का प्रयोग
20 ग्राम धृत कुमारी का गुद्दा और 250ml गिलोय का क्वाथ
लेकर दोनों को मिलाकर औषधि तैयार कर ले। इस औषधि को प्रातः खाली पेट सेवन करने के बाद 2 घंटे तक कोई पेय या खाद्य पदार्थ का सेवन न करें। प्रतिदिन इस औषधि का सेवन करने से अवश्य ही मधुमेह नियंत्रित हो जाता है और रोगी को लाभ मिलता है। यदि ताजा धृतकुमारी उपलब्ध न हो सके तो किसी अच्छी कंपनी का स्वरस भी ले सकते हैं मधुमेह रोगी के लिए यह औषधि के साथ-साथ टॉनिक का भी काम करेगी जिससे उसके स्वास्थ्य में भी अच्छा लाभ मिलेगा।
यकृत दुर्बलता अर्थात लिवर की कमजोरी में धृतकुमारी
एक किलोग्राम घृतकुमारी का रस तथा 1/2 किलोग्राम मधु लेकर दोनों को मिलाकर मिट्टी की हांडी में भरकर धूप में रख दें। लगभग 7 दिन पश्चात इस औषधि योग को छानकर रख ले। लगभग 10 से 20 ग्राम की मात्रा में बल अनुसार सुबह खाली पेट इसका सेवन करें और इसके सेवन करने के 2 घंटे तक कोई पेय या खाद्य पदार्थ का सेवन न करें। इसी प्रकार शाम को भोजन करने से 2 घंटे पूर्व औषधि का सेवन करें। 60 दिनों तक लगातार इस औषधि का सेवन करने से लिवर की कार्य क्षमता बढ़ जाती है और यकृत (लिवर) संबंधी सभी रोग समाप्त हो जाते हैं।
मासिक धर्म मे घृतकुमारी का प्रयोग
10 ग्राम धृत कुमारी का गूदा और उस पर 500 मिलीग्राम पलाश का क्षार छिड़ककर सुबह-शाम खाली पेट सेवन करने से मासिक धर्म से संबंधित सभी विकार नष्ट हो जाते हैं। इस औषधि का लगातार सेवन करने से मासिक धर्म में शुद्धिकरण होता है।
मूत्रकृचछ मे धृत कुमारी का प्रयोग
इस रोग में मूत्र त्याग करते समय बड़ा कष्ट होता है। इसमें मूत्र धीरे-धीरे करके बूंद-बूंद आता है और मूत्र त्याग के समय जलन और पीड़ा होती है। मूत्र नलिका में इंफेक्शन हो जाता है और दर्द की स्थिति लगातार बनी रहती है। इस रोग के होने के मुख्य कारण मूत्रालय की पथरी या प्रोस्टेट माना जाता है। औरतों में यह रोग गर्भाशय के अपने स्थान से हटने के कारण भी हो जाता है। परंतु इसका इलाज संभव है। इसके इलाज में घृतकुमारी का प्रयोग किया जा सकता है। इसके इलाज के लिए सुबह खाली पेट लगभग 30ml एलोवेरा का रस लेकर उसमें कच्ची खांड मिलाकर जल के साथ सेवन करने से मूत्रकृच्छ के रोग में आराम मिलता है और दाह मिटता है। औषधि सेवन करने के 2 घंटे बाद तक कोई पेय पदार्थ अथवा खाद्य पदार्थ का सेवन न करें तो अच्छे परिणाम मिलते हैं।
खूनी बवासीर में धृतकुमारी का प्रयोग
50 ग्राम धृतकुमारी का गुद्दा लेकर उसमें 2 ग्राम गेरू मिलाकर उसकी टिकिया बना ले, फिर उस टिकिया को गुदा मार्ग पर रखकर लंगोट से बांध ले। ऐसा करने से खूनी बवासीर में आराम मिलता है। और बवासीर के मस्सों में संकुचन होकर दब जाते हैं। रक्त आना बंद हो जाता है, और कुछ दिन के प्रयोग से रोग पूर्णतः समाप्त हो जाता है।
गठिया रोग में घृतकुमारी का प्रयोग
घृतकुमारी का गुद्दा लगभग 20 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम भोजन से 2 घंटे पूर्व नियमित सेवन करने से गठिया रोग में अवश्य ही लाभ मिलता है।
झाइयां दूर करने के अधिकारी का प्रयोग
घृतकुमारी का जैल मुंह पर लगाकर धीरे-धीरे मसाज करनी चाहिए, लगातार लंबे समय तक इसका प्रयोग करने से मुंह की झाइयां अवश्य ही ठीक होकर चेहरा साफ सुथरा हो जाता है। तथा चेहरे के रंग में निखार आता है, और चेहरा कांतिमय में हो जाता है। इसमें कुछ ऐसे तत्व मौजूद होते हैं जो त्वचा और चेहरे के लिए बहुत गुणकारी माने जाते हैं।
घृतकुमारी का रासायनिक संघटन
घृतकुमारी में 94% जल तथा शेष 6% भाग में 20 प्रकार के अमीनो एसिड, कार्बोहाइड्रेट एवं अन्य प्रकार के रासायनिक घटक पाए जाते हैं। इसमें मुख्य क्रियाशील तत्व 'एलोइन' नामक ग्लूकोसाइड समूह पाया जाता है, इसका मुख्य घटक बारबेलोइन है। एलोइन त्वचा पर एक सुरक्षा परत का निर्माण करता है जो त्चचा को हानिकारक पराबैंगनी विकिरण से रक्षा करती है। इसी गुण के कारण इसका प्रयोग सौंदर्य प्रसाधन सामग्री निर्माण में किया जाता है।
घृतकुमारी के गुण
यह पचने में भारी, स्निग्ध,पिच्छिल,कटु , शीतल और विपाक मे तिक्त है। घृतकुमारी शीतल और दस्तावर है। नेत्रों के लिए हितकारी तथा वीर्यवर्धक,बलकारक है। यह पुष्टि कारक और रसायन है। यह बात गुल्म, पीलिया, कामला, उदर विकार, यकृत( (liver) रोग नाशक है। यह वात और पित्त के दोषों का संहारक है। यह रुधिर अधिकार तथा त्वचा संबंधी रोगों में लाभदायक है। यह औरतों के लिए हितकर है तथा गर्भाशय संबंधित विकारों में लाभदायक है। यह विरेचक है तथा कृमिघ्न है। यह कई प्रकार के औषधीय गुणों से भरपूर है।
घृतकुमारी के औषधीय प्रयोग
मधुमेह रोग में धृतकुमारी का प्रयोग
20 ग्राम धृत कुमारी का गुद्दा और 250ml गिलोय का क्वाथ
लेकर दोनों को मिलाकर औषधि तैयार कर ले। इस औषधि को प्रातः खाली पेट सेवन करने के बाद 2 घंटे तक कोई पेय या खाद्य पदार्थ का सेवन न करें। प्रतिदिन इस औषधि का सेवन करने से अवश्य ही मधुमेह नियंत्रित हो जाता है और रोगी को लाभ मिलता है। यदि ताजा धृतकुमारी उपलब्ध न हो सके तो किसी अच्छी कंपनी का स्वरस भी ले सकते हैं मधुमेह रोगी के लिए यह औषधि के साथ-साथ टॉनिक का भी काम करेगी जिससे उसके स्वास्थ्य में भी अच्छा लाभ मिलेगा।
यकृत दुर्बलता अर्थात लिवर की कमजोरी में धृतकुमारी
एक किलोग्राम घृतकुमारी का रस तथा 1/2 किलोग्राम मधु लेकर दोनों को मिलाकर मिट्टी की हांडी में भरकर धूप में रख दें। लगभग 7 दिन पश्चात इस औषधि योग को छानकर रख ले। लगभग 10 से 20 ग्राम की मात्रा में बल अनुसार सुबह खाली पेट इसका सेवन करें और इसके सेवन करने के 2 घंटे तक कोई पेय या खाद्य पदार्थ का सेवन न करें। इसी प्रकार शाम को भोजन करने से 2 घंटे पूर्व औषधि का सेवन करें। 60 दिनों तक लगातार इस औषधि का सेवन करने से लिवर की कार्य क्षमता बढ़ जाती है और यकृत (लिवर) संबंधी सभी रोग समाप्त हो जाते हैं।
मासिक धर्म मे घृतकुमारी का प्रयोग
10 ग्राम धृत कुमारी का गूदा और उस पर 500 मिलीग्राम पलाश का क्षार छिड़ककर सुबह-शाम खाली पेट सेवन करने से मासिक धर्म से संबंधित सभी विकार नष्ट हो जाते हैं। इस औषधि का लगातार सेवन करने से मासिक धर्म में शुद्धिकरण होता है।
मूत्रकृचछ मे धृत कुमारी का प्रयोग
इस रोग में मूत्र त्याग करते समय बड़ा कष्ट होता है। इसमें मूत्र धीरे-धीरे करके बूंद-बूंद आता है और मूत्र त्याग के समय जलन और पीड़ा होती है। मूत्र नलिका में इंफेक्शन हो जाता है और दर्द की स्थिति लगातार बनी रहती है। इस रोग के होने के मुख्य कारण मूत्रालय की पथरी या प्रोस्टेट माना जाता है। औरतों में यह रोग गर्भाशय के अपने स्थान से हटने के कारण भी हो जाता है। परंतु इसका इलाज संभव है। इसके इलाज में घृतकुमारी का प्रयोग किया जा सकता है। इसके इलाज के लिए सुबह खाली पेट लगभग 30ml एलोवेरा का रस लेकर उसमें कच्ची खांड मिलाकर जल के साथ सेवन करने से मूत्रकृच्छ के रोग में आराम मिलता है और दाह मिटता है। औषधि सेवन करने के 2 घंटे बाद तक कोई पेय पदार्थ अथवा खाद्य पदार्थ का सेवन न करें तो अच्छे परिणाम मिलते हैं।
खूनी बवासीर में धृतकुमारी का प्रयोग
50 ग्राम धृतकुमारी का गुद्दा लेकर उसमें 2 ग्राम गेरू मिलाकर उसकी टिकिया बना ले, फिर उस टिकिया को गुदा मार्ग पर रखकर लंगोट से बांध ले। ऐसा करने से खूनी बवासीर में आराम मिलता है। और बवासीर के मस्सों में संकुचन होकर दब जाते हैं। रक्त आना बंद हो जाता है, और कुछ दिन के प्रयोग से रोग पूर्णतः समाप्त हो जाता है।
गठिया रोग में घृतकुमारी का प्रयोग
घृतकुमारी का गुद्दा लगभग 20 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम भोजन से 2 घंटे पूर्व नियमित सेवन करने से गठिया रोग में अवश्य ही लाभ मिलता है।
झाइयां दूर करने के अधिकारी का प्रयोग
घृतकुमारी का जैल मुंह पर लगाकर धीरे-धीरे मसाज करनी चाहिए, लगातार लंबे समय तक इसका प्रयोग करने से मुंह की झाइयां अवश्य ही ठीक होकर चेहरा साफ सुथरा हो जाता है। तथा चेहरे के रंग में निखार आता है, और चेहरा कांतिमय में हो जाता है। इसमें कुछ ऐसे तत्व मौजूद होते हैं जो त्वचा और चेहरे के लिए बहुत गुणकारी माने जाते हैं।
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