सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

त्रिफला TRIPHLA

त्रिफला 

त्रिफला बनाने की विधि

त्रिफला के लाभ

त्रिफला हमारे आयुर्वेदिक चिकित्सा शास्त्र में एक बहुत महत्वपूर्ण और उपयोगी आयुर्वेदिक औषधि है। त्रिफला का शाब्दिक अर्थ होता है 'तीन फल' अर्थात यह तीन फलों " हरड़, बहेड़ा, आंवला " से मिलकर बना है इसलिए इसे त्रिफला कहा जाता है। आयुर्वेदिक शास्त्र में त्रिफला के संदर्भ में बहुत विस्तृत से वर्णन किया गया है और इसे त्रिदोष नाशक माना गया है। यह एक ऐसी अद्भुत औषधि है जो वात, पित्त, कफ तीनों को संतुलित करने में सक्षम है। और आयुर्वेदिक शास्त्र में इसे एक अद्भुत आयुर्वेदिक रासायन का नाम दिया गया है। और इसे अमृत तुल्य माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार  "ऐसी आयुर्वेदिक औषधि जिसके द्वारा हमारे शरीर में शुभ गुण युक्त रस आदि धातुओं की प्राप्ति हो वह रसायन कहलाता है।" हमारे शरीर में सर्वदा  होने वाली धातुओं की क्षीणता को रसायन पूर्ण किया करता है। रसायन के सेवन से मनुष्य को आरोग्य प्राप्त होता है तथा देह और इंद्रिया परम बलशाली हो जाती है। इसका सेवन करने वाला निरोगी रहते हुए हमेशा तरुणवय ( युवा अवस्था को  प्राप्त ) रहकर सौ वर्षों तक  जीवित रहता है।
त्रिफला


त्रिफला बनाने की विधि ---: हरड़, बहेड़ा, आंवला को मिलाकर त्रिफला का निर्माण किया  जाता है। परंतु इसमें विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि इनकी मात्रा कितनी कितनी निश्चित किए जाएं। इसका वर्णन इस प्रकार है :

(1) हरड        -------      एक भाग
(2) बहेडा      -------      दो भाग
(3) आमला    -------      तीन भाग
           
अर्थात -- 1 : 2 :3  की मात्रा में हरड़ बहेड़ा आंवला को लेना है। जैसे उदाहरण के तौर पर आपको 300 ग्राम त्रिफला तैयार करना है तो उसमें 50 ग्राम हरड़, 100 ग्राम बहेड़ा, और 150 ग्राम आमला ले। तीनों को कूट पीसकर कपड-छान (कपडे से छानना ) कर ले। उत्तम परिणाम पाने के लिए अनुपात का विशेष ध्यान रखें। एक बार में उतना ही चूर्ण तैयार करें जो चार महीने तक चल जाए। क्योंकि चार महीने से ज्यादा पुराने चूर्ण की शक्ति क्षीण होने लगती है। बाजार से किसी विश्वसनीय कंपनी का बना हुआ चूर्ण भी प्राप्त कर सकते हैं परंतु उसमें यह ध्यान रहे कि कुछ कंपनियां बहुत पुराना चूर्ण भी रखती हैं। घर में बना हुआ चूर्ण ही श्रेष्ठ होता है।

त्रिफला सेवन की विधि --- मात्रा का ध्यान रखते हुए किसी भी उम्र का व्यक्ति त्रिफला का सेवन कर सकता है। आयुर्वेदाचार्ययो ने इसकी मात्रा का निर्धारण आयु के अनुसार  शारीरिक बल और स्थिति का विचार करते हुए दो ( 2 ) से छः ( 6 ) ग्राम की मात्रा का सेवन करना सही वताया है। आयुर्वेदिक शास्त्र में ॠतुओ के अनुसार भी त्रिफला सेवन का निर्देश दिया है। भारतवर्ष में पूरे वर्ष भर में छः ॠतुऐ  होती हैं। ऋतुओ के अनुसार शरीर की स्थिति में भी परिवर्तन होता रहता है इसलिए आयुर्वेदाचार्यो ने किस ऋतु में त्रिफला के साथ क्या मिलाकर सेवन करना है इस बात पर जोर दिया है।  इसका वर्णन इस प्रकार है-

(1) बसंत ऋतु ( चैत्र और वैशाख मास ) मे त्रिफला का सेवन सहद के साथ चाट कर करना चाहिए ।
(2)  ग्रीष्म ॠतु ( ज्येष्ठ और अषाढ ) मे त्रिफला गुड़ के साथ मिलाकर खाना चाहिए।
(3) वर्षा ऋतु    ( सावन और भाद्रपद) मे त्रिफला का  सेंधा नमक के साथ मिलाकर लेना चाहिए।
(4) शरद ऋतु   (अश्विन और कार्तिकेय) मे त्रिफला का सेवन खांड के साथ  करना चाहिए।
(5) हेमंत ऋतु     (अघहन और पौष ) मे सोंठ के चूर्ण के साथ त्रिफला का सेवन करना चाहिए।
(6) शिशिर ॠतु  ( माघ और फाल्गुन) मे पीपल के चूर्ण के साथ त्रिफला का सेवन करना चाहिए।

त्रिफला के लाभ -- आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार त्रिफला सेवन के लाभ का वर्णन इस प्रकार किया गया है।
(1) आयुर्वेद में त्रिफला को अमृततुल्य माना जाता है। यह वात पित्त और कफ को संतुलित करते हैं और त्रिदोष नाशक है।
(2) एक वर्ष तक त्रिफला का सेवन करने से शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है।
(3) दो वर्ष तक  त्रिफला का सेवन करते रहने से शरीर के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं।
(4) तीन वर्ष तक त्रिफला का सेवन करने से नेत्र
ज्योति बढ़ जाती है। और आंखों के सभी रोग समाप्त हो जाते
हैं ।
(5) पांच वर्ष तक त्रिफला का सेवन करने से मनुष्य बहुत बुद्धिमान हो जाता है।
(6) छः वर्ष तक त्रिफला का सेवन करने से निर्बल व्यक्ति भी महाबली हो जाता है।
(7) सात वर्ष तक त्रिफला का सेवन करने से श्र्वेत बाल भी काले हो जाते हैं। और आठवें वर्ष वृद्ध व्यक्ति भी तरूण (जवान) अवस्था को प्राप्त होता है।
(8) नौ वर्ष तक त्रिफला का सेवन करने से व्यक्ति आगम बुद्धि हो जाता है और विवेकशील हो जाता है।
(9) दस वर्ष तक त्रिफला का सेवन करने से कंठ में मां सरस्वती विराजमान हो जाती है और माता शारदा की कृपा प्राप्त होती।
(10) ग्यारह से बारह वर्ष त्रिफला का सेवन करने से मनुष्य की वाणी सिद्ध हो जाती है और वह जो कहें वही हो जाता है  अर्थात परम सिद्ध हो जाता है।
(11) रात को त्रिफला का सेवन करने से यह विरेचन का काम करता है और पेट को साफ करता है। आंतों को मजबूत बनाता है।
(12) दिन में त्रिफला का सेवन करने से गैस बदहजमी  को दूर करता है और पाचन क्रिया को मजबूत करता है।
(13) सुबह खाली पेट त्रिफला का सेवन करने से शरीर के सभी रोगों का नाश होता है और डायबिटीज और बीपी जैसे रोग  शांत हो जाते।
(14) आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए रात के समय त्रिफला को पानी में भिगोया  जाता है। और सुबह उठकर उससे  पानी से आंखों को धोया जाता है जिससे आंखों की रोशनी बढ़ती है।(15) संयम नियम से रहते हुए विधि पूर्वक त्रिफला का सेवन करने से शरीर के सभी रोग नष्ट हो  जाते हैं और कायाकल्प होकर नवजीवन प्राप्त होता है।







टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Aloevera benefits in Hindi धृतकुमारी ALOEVERA

घृतकुमारी ALOEVERA (Aloevera Benefits in Hindi) घृतकुमारी एक औषधीय वनस्पति है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में धृत कुमारी के  औषधीय गुणो की महिमा का बहुत वर्णन किया है। इसका विधि पूर्वक सेवन करने से एक स्वस्थ व्यक्ति अपने स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए निरोगी जीवन व्यतीत कर सकता है तथा दूसरी ओर यदि कोई रोगी व्यक्ति रोगानुसार विधि पूर्वक इसका  सेवन करें तो वह स्वास्थ्य प्राप्त कर सकता हैं। इसका पौधा भारत में सर्वत्र पाया जाता है। औषधीय गुणों के साथ साथ  सुंदर दिखने की वजह से कुछ लोग इसे गमलों में लगाकर अपने घरों में रखते है। इसमें कांड नहीं होता जड़ के ऊपर से ही चारों तरफ मासल गुद्दे से परिपूर्ण एक से दो इंच  मोटे होते हैं। इसके पत्तों को काटने पर पीताम वर्ण का पिच्छिल द्रव्य निकलता है। जो ठंडा होने पर जम जाता है, जिसे  कुमारी सार कहते हैं। वर्तमान समय में अनेक आयुर्वेदिक औषधियों में इसका प्रयोग किया जाता है। इसकी अधिक डिमांड होने की वजह से भारतवर्ष में व्यापक रूप से इसकी खेती की जाती है। शुष्क भूमि में भी इसकी खेती आसानी से हो जाती है। इसकी खेती में अधिक जल की आवश्यकता...

सफेद मूसली के फायदे।, Safedmusli benefits in Hindi

सफेद मूसली के फायदे (Safedmusli benefits in Hindi) सफेद मूसली का परिचय सफेद मूसली एक शक्तिवर्धक औषधीय वनस्पति है जिसका आयुर्वेदिक औषधियों में बहुत प्रयोग किया जाता है। सफेद मूसली के जड़ और बीज का औषधियों में अधिक महत्व होता है। आयुर्वेद में अनेकों औषधियों के निर्माण में सफेद मूसली का प्रयोग किया जाता है। विशेषकर शक्तिवर्धक और वाजीकरण औषधिओं में इसका अधिक प्रयोग किया जाता है। इसकी जड़ों में  कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, पोटैशियम ,फाइबर , कैल्शियम तथा मैग्नीशियम आदि तत्व पाए जाते हैं। इसका कंद औषधीय गुणों से भरपूर होता है जिसका प्रयोग अनेकों रोगों में किया जाता है। यह एक अद्भुत औषधि है।  यह कामोत्तेजक और कफ को हरने वाला माना जाता है। यह हृदय विकार और डायबिटीज जैसे रोगों में भी बहुत फायदा करता है।यह सांस के रोग में बहुत लाभकारी माना जाता है। और खून की कमी या अनिमिया जैसे रोगों को दूर करता है इसके अलावा यह अनेकों रोगों में इसका अन्य औषधियों के साथ प्रयोग करके लाभ उठाया जा सकता है। आयुर्वेद शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि सफेद मूसली का अन्य औषधियों के साथ प्रयोग करके बहुत रोगों को नष्ट...

Mal Kangni ke fayede in hindi मालकांगनी ( ज्योतिषमति) के फायदे

मालकांगनी के फायदे (Malkangni Benefits in Hindi ) मालकांगनी एक औषधीय वनस्पति है इसे ज्योतिषमति के नाम से भी जाना जाता है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसके गुणों का विस्तार से  वर्णन किया गया है। आयुर्वेदिक चिकित्सा के अनुसार कई रोगों में इसका प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेद के महान ऋषि ने अपनी पुस्तक चरक संहिता में इस औषधि के कई रोगों में प्रयोग के बारे में वर्णन किया है। परंतु विशेष रूप से उन्होंने इस औषधि का प्रयोग शिरोविरेचनार्थ, अपस्मार, कुष्ठ और मिर्गी जैसे रोगों में विशेष रूप से औषधीय प्रयोग करने का वर्णन किया गया है। मालकांगनी का प्रयोग तेज दिमाग, कमजोरी दूर करना, और पुरुषों के रोगों में भी प्रयोग किया जाता है। मालकांगनी की प्रकृति गरम होती है इसके फूल पीले और हरे रंग के होते हैं और स्वाद में खाने में थोड़ा कड़वापन होता है। इसके फलों, पत्तों और जड़ों का प्रयोग औषधि के रूप में किया जाता है। इसके बीजों को औषधि के लिए अधिक प्रयोग किया जाता है। गर्म तासीर के व्यक्ति को  इसका प्रयोग अपना बल विचार करके या किसी वैद्य के निर्देशानुसार करना चाहिए। मालकांगनी के पौधे पहाड़ों और ऊंचे स्था...