गिलोय GILOYA
गिलोय एक औषधीय वनस्पति है। आयुर्वेदिक ग्रंथों मे इसके औषधीय गुणों की महिमा का बहुत वर्णन किया गया है। आयुर्वेद में इसे कई नामों से जाना जाता है जैसे अमृता, गुडूची, चक्रांगी, छिन्नरूहा आदि। बहुत वर्षों तक चलने वाली, कभी न सूखने वाली तथा अमृत जैसे औषधीय गुणों वाली होने के कारण इसे अमृता नाम से जाना जाता है। कई प्रकार की औषधियों में इसका प्रयोग होता है। गिलोय को ज्वर की रामबाण औषधि माना जाता है। इसकी बेल प्राय़ः जंगलों में, खेतों की मेढो पर तथा पहाड़ी चट्टानों पर कुंडलाकार चढ़ती हुई मिलती है। यह आम और नीम के वृक्षों पर भी चढ़ती हुई मिलती है। कुन्तालाकार कर्म में यह जिस वृक्ष पर चढ़ती है उस के कुछ गुण भी अपने अंदर समाहित कर लेती है। नीम के वृक्ष पर चढ़ी हुई गिलोय औषधीय गुणों में श्रेष्ठ मानी जाती है। इसके तने से वायवीय जड़े निकलकर झूलती रहती है, जो भूमि के अंदर घुसकर नए पौधे को जन्म देती है। यह भारतवर्ष में प्रायः कुमाऊं से आसाम, बिहार से कर्नाटक तथा सिलोन तक सब जगह पाई जाती है। वर्तमान समय में औषधीय निर्माण में इसकी आवश्यकता बढ़ने से इसकी मांग बढ़ गई है। इसलिए खेती के रूप में भी इसकी पैदावार की जा रही है।
गिलोय का रासायनिक संघठन
गिलोय में अनेक कड़वे जैव सक्रिय संघटक पाए जाते हैं। इसके कांड में लगभग 1.2% स्टार्च की मात्रा पाई जाती है। गिलोय में 'गिलोइन' नामक एक कड़वा ग्लोकोसाईड तथा तीन प्रकार के एल्कोलाइड होते हैं, जिनमें एक क्षाराभ बर्वेरीन है। इसके अतिरिक्त तिक्त ग्लूकोसाइड,गिलोयमिन,कैसमेंथिन, पामारिन,रीनात्पेरीन, टीनोस्पोरिक, नामक जैव सक्रिय पदार्थ पाए जाते हैं। इसमें एक उड़शील तेल होता है एंव वसा,अल्कोहल,ग्लिसरौल एंव एसेंशियल ऑयल तथा कई प्रकार के वसा अम्ल पाए जाते हैं।
गिलोय के गुण धर्म
गिलोय त्रिदोष नाशक है। स्निग्ध होने से वात, तिक्त कषाय होने से कफ और पित्त का शमन करता है। यह कुष्ठघ्न, वेदनास्थापन, तृष्णा निग्रहण, छर्दिनिग्रहण, दीपन, पाचन,पित्तसारक, अनुलोम, और कृमिघ्न है। अमाशयगत अम्लता इससे दूर होती है। यह हृदय को बल देने वाली, रक्त विकार तथा पांडु रोग में गुणकारी है। यह कास हर, दौर्बल्य का नाश करने वाली, और मधुमेह रोग को दूर करने वाली हे। त्वचा रोग और सभी प्रकार के ज्वरो में गिलोय बहुत गुणकारी मानी जाती है। क्षय को उत्पन्न करने वाले जीवाणुओं का नाश करती है। आधुनिक चिकित्सा शास्त्रियों के विचार से जो लो सूक्ष्म तम समूह के विचारों से गिलोय सूक्ष्म तम विषाणु समूह से लेकर स्थूल कृमियो तक पर अपना प्रभाव दर्शाती है। शरीर में किसी भी भाग में रोग के जीवाणु शांत पड़े हो , गिलोय वहीं पर पहुंचकर उनका नाश अवश्य करती हैं। ई कोलाई नामक जीवाणु जो आंत और मूत्रवहसंस्धान के साथ-साथ पूरे शरीर को प्रभावित करता है, उसको जड़ से उखाड़ डालती हैं।
गिलोय के रसायन का ग्लूकोज का टालरेंस तथा एड्रिनेलिन जन्य लाइसीमिया मे इसका लाभकारी तथा त्वरित परिणाम होता है। यह शरीर में इंसुलिन की उत्पत्ति तथा रक्त में उसकी घुलनशील को बढ़ाती है।
गिलोय के औषधीय प्रयोग ।। गिलोय के फायदे
मधुमेह में गिलोय का प्रयोग
20 ग्राम गिलोय तथा 5 ग्राम त्रिफला को आधा लीटर गरम जल में शाम के समय भिगोकर रख दें। लगभग 12 घंटे पश्चात अर्थात सुबह उस पानी को या तो खरल में घोटले या मिक्सि में ग्राइंड करके कपड़े से छान लें। फिर इस औषधि को सुबह खाली पेट सेवन करें। इसमें विशेष ध्यान रखने योग्य बात यह है कि इस औषधि के सेवन के बाद 2 घंटे तक कुछ खाए पिए ना। तब इस औषधि का अच्छा परिणाम देखने को मिलता है। यह औषधि शरीर में इंसुलिन उत्पन्न करके उसे रक्त में घुलनशील बनाती है। इस औषधि के सेवन से आरंभ में ही लाभ मिलना शुरू हो जाता है, परंतु कुछ महीने लगातार सेवन करने से मधुमेह नियंत्रित होकर रोगी हमेशा के लिए अवश्य ही स्वस्थ हो जाता है इसमें कोई संदेह नहीं।
पांडु रोग में गिलोय का प्रयोग
गिलोय, पुनर्वा, नीम की छाल, पटोल-पत्र, कटुकी सोंठ, हरड़ और दारूहल्दी प्रत्येक 20 ग्राम की मात्रा में लेकर 320 ग्राम जल में क्वार्ट्ज तैयार कर ले अर्थात 320 ग्राम जल में लेकर इन औषधियों को उबालने और जब यह 80 ग्राम शेष रह जाए तो उसे ठंडा कर कर रख लें इस प्रकार औषधि तैयार हो जाती है। इस क्वाथ औषधि की 20ml (मिलीलीटर) की मात्रा में सुबह खाली पेट सेवन करें और औषधि सेवन के 2 घंटे बाद तक किसी भी पेइजा खाद्य पदार्थ का सेवन न करें इसी तरह शाम को भोजन से 2 घंटे पूर्व औषधि का 40 दिन तक सेवन करने से पांडु रोग, सर्वांग शोथ, उदर रोग, पार्शवशूल,श्वांस जैसे रोग नष्ट हो जाते हैं।
रक्त कैंसर में गिलोय का प्रयोग
गिलोय का स्वरस 25 ग्राम और समान मात्रा में गेहूं के
ज्वारे का रस लेकर सुबह खाली पेट, दोपहर को भोजन से 2 घंटे पूर्व और शाम को भोजन से 2 घंटे पूर्व लगातार लंबे समय तक सेवन करने से रक्त कैंसर जैसे भयानक रोग में लाभ मिलता है।
पीलिया रोग में गिलोय का प्रयोग
(i) गिलोय रस 1 किलो और दूध 4 किलो लेकर उसे 1 किलो घी में मिलाकर मंदाग्नि पर धीरे-धीरे पकाए जब दूध और गिलोय रस जलकर केवल घी शेष रह जाए तो उसे छानकर रख ले इस प्रकार यह औषधि तैयार हो जाती है। इस औषधि की 10 ग्राम की मात्रा और उसमें चौगुना दूध मिलाकर सुबह शाम लगातार 40 दिन तक सेवन करने से पांडु रोग, कामला, और उदर संबंधित सभी रोग समाप्त हो जाते है।
(ii) 50 ग्राम गिलोय की टहनी लेकर आधा किलो ग्राम जल में अग्नि पर पकाकर जब चतुर्थांश शेष रह जाए तो उसे छानकर रख लें इस प्रकार क्वाथ तैयार हो जाता है। 25 ग्राम कोट में 10 ग्राम शहद मिलाकर दिन में 4 बार प्रतिदिन सेवन कराने से जल्द ही पीलिया रोग समाप्त हो जाता है। रोगी के लिए तैलीय खाद्य पदार्थों का परहेज रखना आवश्यक है।
(iii) गिलोय के पत्तों का चूर्ण 2 ग्राम लेकर उसमें समान मात्रा में शहद मिलाकर दिन में 4 बार सेवन करने से और गिलोय के पत्तों की माला गले में धारण करने से जल्द ही पीलिया रोग में लाभ मिलता है।
मंदाग्नि व पेट के अन्य रोगों में गिलोय का प्रयोग
ताजी गिलोय 18 ग्राम, अजमोद 2 ग्राम, छोटी पीपल 2 ग्राम, नीम की सीक 2 ग्राम को कूटकर 250 ग्राम जल में शाम को मिट्टी के बर्तन अर्थात मिट्टी की हांडी में भिगोकर रख दें। सुबह इसे घोट कर छान कर सुबह खाली पेट सेवन करें और 2 घंटे तक कोई पेय और खाद्य पदार्थ का ग्रहण न करें। ऐसा 40 दिन लगातार करने से मंदाग्नि रोग और पेट के अन्य सभी प्रकार के रोगों से मुक्ति अवश्य ही मिल जाती है।
गठिया रोग में गिलोय का प्रयोग
गिलोय का चूर्ण दो से 4 ग्राम की मात्रा में गाय के दूध के साथ दिन में दो से तीन बार लगातार 40 दिन सेवन करने से गठिया जैसे रोग से छुटकारा मिल जाता है।
कुष्ठ रोग में गिलोय का प्रयोग
गिलोय का स्वरस 20 से 30 ग्राम की मात्रा में दिन में सुबह शाम और दोपहर तीन बार लगातार छह महीने तक सेवन करने से कुष्ठ रोग में अवश्य ही लाभ मिलता है। इसमें ध्यान देने योग्य बात यह है कि रोगी को नमक, खटाई, तैलीय पदार्थ आदि का परहेज रखना आवश्यक है।
जीर्ण ज्वर में गिलोय का प्रयोग
पिछले 6 दिन या उससे अधिक समय से चले आ रहे ज्वर को जीर्ण ज्वर कहते हैं। अर्थात कई दिनों से हुआ बुखार जब नहीं टूटता तो उसे जीर्ण ज्वर की अवस्था कहते हैं। ऐसी स्थिति में 40 ग्राम गिलोय को कूट कर 250 ग्राम जल मैं मिलाकर मिट्टी के बर्तन में शाम को रख दे। सुबह उस जल को घोट कर छान ले। इस औषधि को 20 ग्राम की मात्रा में दिन में चार बार सेवन कराने से कई दिनों से बुखार से पीड़ित रोगी अवश्य ही स्वस्थ हो जाता है।
गिलोय के 20 ग्राम रस में 5 ग्राम मधु और 1 ग्राम पिप्पली का चूर्ण मिलाकर दिन में चार बार प्रतिदिन सेवन करने से जीर्ण ज्वर, पीलिया तथा अन्य सभी प्रकार के ज्वार नष्ट हो जाते हैं।
जोड़ों के दर्द मे गिलोय का प्रयोग
जोड़ों के दर्द को आयुर्वेद में वात रक्त रोग की संज्ञा दी गई है इस रोग में गिलोय बहुत उपयोगी मानी जाती है और गिलोय के सेवन से रोगी को बहुत जल्द लाभ मिलता है। रोग की ऐसी स्थिति में गिलोय के 50 ग्राम क्वाथ के साथ मुंडी का चूर्ण 5 ग्राम, शहद 5 ग्राम, घी 5 ग्राम मिलाकर दिन में दो बार सेवन करने से शरीर की हड्डियों के जोड़ों के दर्द में अवश्य ही लाभ मिलता है। इसको लेने की सही विधि यह है कि पहले चूर्ण का सेवन करें और ऊपर से क्वाथ का सेवन करना चाहिए। रोग को समूल नष्ट करने के लिए 60 दिन तक इस औषधि का सेवन करना चाहिए।
प्रमेह रोग में गिलोय का प्रयोग
गिलोय के 50 ग्राम स्वरस में 10 ग्राम मधु मिलाकर दिन में दो से तीन बार लगातार 60 दिन तक सेवन करने से दुष्ट प्रमेह रोग में अवश्य लाभ मिलता है। अथवा 5 ग्राम गिलोय का चूर्ण और समान मात्रा में मिश्री मिलाकर दिन में तीन से चार बार जल के साथ सेवन करने से प्रमेह रोग समाप्त हो जाते हैं।
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