उत्सर्जन तंत्र Excretory system
आहार के रूप में ग्रहण किए गए भोजन व जल का वह भाग जो हमारा शरीर पचा नहीं पाता वह मल मूत्र व पसीने के रूप में उत्सर्जित होता है। इन तत्वों का शरीर से बाहर निकलना अति आवश्यक है ताकि शरीर विष संक्रमित न हो यह महत्वपूर्ण कार्य उत्सर्जन तंत्र द्वारा संपादित किया जाता है। उत्सर्जन तंत्र के मुख्य फेफड़े गुर्दे मुद्रा से तथा छोटी और बड़ी आंत है यहां इन अंगों की कार्यप्रणाली पर संक्षेप में चर्चा करेंगे।
(1) फेफड़े ( lungs) :- उत्सर्जन तंत्र के विषय में फेफड़े की चर्चा करना विस्मयकारी प्रतीत होता है। हमारे शरीर में फेफड़े जोड़े के रूप में स्थित होते हैं ।फेफडो़ं की मुख्य क्रिया वायुमंडल से से ऑक्सीजन के रूप में प्राणवायु लेकर उसे हृदय द्वारा संचालित रक्त परिसंचरण तंत्र द्वारा हमारे शरीर के रक्त में प्रवाहित अर्थात मिलाना और रक्त से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर उसे वातावरण में छोड़ना है। यह शुद्ध रक्त फुफ्फुसीय शिरा द्वारा हृदय में पहुँचता है, जहां से यह फिर से शरीर के विभिन्न अंगों मे पम्प किया जाता है। कार्बन डाइऑक्साइड गैस को शरीर से बाहर निकालना मानव जीवन के लिए अति आवश्यक है यदि ऐसा न हो तो रक्त में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा सामान्य से अधिक बढ़ जाएगी जो जो हमारे शरीर के लिए घातक सिद्ध होगा।
(2) गुर्दे (किडनी ) :- शरीर की कोशिकाओं को अपनी गतिविधियों को संपादित करने के लिए प्रोटीन की आवश्यकता होती है। जब कोशिकाओं द्वारा प्रोटीन का विभाजन किया जाता है । तो अवशेष के रूप में नाइट्रोजन शेष रह जाता है। गुर्दे का प्रमुख कार्य रक्त में से इन नाइट्रोजन को छानकर बाहर निकालना है। इसके अतिरिक्त गुर्दे का कार्य शरीर में पानी की मात्रा को नियंत्रित करना भी है। गुर्दे की कार्यप्रणाली काफी जटिल है । गुर्दे प्रति मिनट लगभग 1 लीटर रक्त धमनियों से प्राप्त करके उसका शोधन करते हैं। इस प्रक्रिया के पश्चात शोधित रक्त तृक्किया धमनी द्वारा पुनः शरीर में प्रवाहित कर दिया जाता है। तथा अवशेष स्वरूप को मूत्र जिसमें पानी यूरिया व अमीना अमल सम्मिलित होते हैं । जिसे मूत्राशय की ओर भेज दिया जाता है। मूत्र का उत्पादन करते समय, गुर्दे यूरिया और अमोनियम जैसे अपशिष्ट पदार्थ उत्सर्जित करते हैं; गुर्दे जल, ग्लूकोज़ और अमिनो अम्लों के पुनरवशोषण के लिये भी ज़िम्मेदार होते हैं। गुर्दे हार्मोन भी उत्पन्न करते हैं, जिनमें कैल्सिट्रिओल (calcitriol), रेनिन (renin) और एरिथ्रोपिटिन (erythropoietin) शामिल हैं। इस पूरी प्रक्रिया में अवशेष स्वरूप जो मूत्र जिसमेंं पानी, यूरिया व अमीनो अमल सम्मिलित होते हैं वे शेष रह जाते हैं वह यूरेटन नामक दो नलिकाओ द्वारा मूत्राशय में चला जाता है।
(3) मूत्राशय ( Bladder) :- गुर्दे द्वारा दिन-रात मूत्र बनाने की प्रक्रिया चलती रहती है जिसके फलस्वरूप 24 घंटों में लगभग 2 लीटर मूत्र का निर्माण होता है वह मुत्र गुर्दे से मूत्राशय में आता है। मूत्राशय एक खोखला अंग है। मूत्रता वाहिनी नलिकाऐ मूत्राशय मूत्राशय के ऊपरी भाग में आकर मिलती है। जहां एक वर्गीय कपाट होता है जो मूत्र को पुनः गुर्दे की ओर वापस लौटने से रोकता है। मूत्राशय से मूत्र का निकास मूत्र मार्ग द्वारा होता है जो मूत्राशय से सबसे निचले हिस्से से आरंभ होता है। यह द्वार एक गोलाकार अवरोधनी मांसपेशी द्वारा खुलता व बंद होता है। मूत्र त्याग के समय यह मांसपेशी खुल जाती है और मूत्राशय से से भरा मूत्र मार्ग द्वारा बाहर आ जाता है। मूत्र त्याग के पश्चात यह मांसपेशी पुनः संकुचित होकर मूत्र मार्ग को बंद कर देती है।
(4) छोटी बड़ी आंते ( small intestine & large intestine) :-- जब हम भोजन करते हैं तब वह आमाशय मे लगभग तीन घंटे तक रहता है, जहां इसमें अनेक प्रकार के अमल वह एंजाइम आकर मिलते हैं। इस प्रक्रिया के फल स्वरुप भोजन बिल्कुल तरल होकर छोटी आंत में चला जाता है। छोटी आत के पहले भाग ग्रहणी में पाचन ग्रंथि यानी पैंक्रियाज तथा पित्ताशय से पाचक में पहुंचकर हमारे रक्त में मिल जाता है। भोजन का अपचा भाग छोटी आंत के प्रथम भाग तृवहदान्त्र में पहुंचता है ,जहां अपने भोजन में उपस्थित पानी वृहदान्त्र की दीवारों द्वारा रक्त में मिल जाता है। जो अपचन भोजन जो ठोस रूप में होता है वह बड़ी आंत के अंतिम भाग रैक्टम में चला जाता है, जहां यह कुछ समय तक पड़ा रहता है। तत्पश्चात मल त्याग के समय मल के रूप में गुदा द्वारा बाहर निकल जाता है।
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