आयुर्वेद के अनुसार यदि व्यक्ति अपने आहार विहार तथा मन संतुलन संबंधी कुछ सूत्रों को जीवन में उतारने को कृतसंकल्प हो जाए तो वर्तमान की व्याधि का निवारण तथा भावी रोगो की संभावनाओं को टाला जा सकता है।
आहार : (1) आरोग्य स्वाभाविक है उसे प्रकृति की देन समझना चाहिए जो हर प्राणी को सहज उपलब्ध है। दुर्बलता एवं रुग्णता अस्वाभाविक है उसे मनुष्य द्वारा प्रकृति व्यवस्था के उल्लंघन का दंड समझना चाहिए। जो बुद्धिमान समझे जाने वाले महा मूर्ख मनुष्य ने अपने आहार विहार में व्यक्तिकर्म करते हुए न्योता दिया है। जिन्हें आरोग्य अपेक्षित हो व प्राकृतिक जीवन जीना आरंभ करें और विवेक युक्त नीति मर्यादा के साथ समझौता कर ले इतने भर से भूलो का परिमार्जन हो जाएगा और खोए स्वास्थ्य को फिर पा सकने का नया आधार बनेगा। आरोग्य रक्षा बहुमूल्य आहार एवं औषधियों के सहारे नहीं प्रकृति की मर्यादाओं को शिरोधार्य करने अभ्यस्त हटवादिता छोड़ने से ही हो सकती है
(2) बिना कड़ी भूख लगे भोजन न करें ठूस ठूस कर पेट ना भरे आधा आहार के लिए चौथाई पानी के लिए और चौथाई हवा के लिए पेट में स्थान खाली रहने दे ।जल्दी-जल्दी न निगले ग्रास को मुंह में अच्छी तरह चबाने के बाद ही उद्रस्त करें दांतो का काम ऑतो को करने के लिए विवश न करें मुख के स्राव पर्याप्त मात्रा में नए मिले तो निकला हुआ भोजन अपच उत्पन्न करेगा
बार बार भोजन न करें। प्रोढो के लिए दो बार वृद्धों के लिए एक बार भोजन करना पर्याप्त है बच्चे थोड़ा-थोड़ा करके तीन बार भी कर सकते हैं उन्हें लॉड चाव वश बड़ों के साथ बैठकर नहीं खाना चाहिए उनका भोजन हल्का और सुपाच्य होना चाहिए मात्रा भी विवेक युक्त परिमाण में रखें बड़ों के साथ खाने से यह भी मरियादा टूट जाती हैं और साथ बिठाकर खिलाने का दुलार हर दृष्टि से अहितकर सिद्ध होता है।
(3) आहार को अधिक पीसने ,छानने, तलने, भूनने से उसके स्वाभाविक गुण नष्ट हो जाते हैं और सारी वस्तुएं पेट पर लदती है इससे पाचन तंत्र का काम तो बढ़ता है पर पोषण नहीं मिलता है।
जहां तक संभव हो अनाज ,दाल ,शाक ,फल आदि के छिलके ने हटाए जाएं उन में पोषक तत्वों का बाहुल्रय रहता है। हरी साग भाजी मौसमी फल आहार में अधिक रहें । अन्न अंकुरित कर लेने से उसकी पोषण शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। कड़ी आग पर ने
नै पकाएं उबालकर काम चलाएं भाप से पकाने की पद्धति हर दृष्टि से उपयोगी है मसाले कम से कम प्रयोग करें चीनी के स्थान पर गुड ले घी तेल भारी होता है उनकी आवश्यकता उन पदार्थों से पूरा करें जिनसे यह चिकनाई निकलती है ।
(4) सप्ताह में 1 दिन उपवास करने की आदत डालनी चाहिए। जब सभी कर्मचारियों को नई स्फूर्ति अर्जित करने के लिए साप्ताहिक अवकाश मिलता है तो पेट को छुट्टी क्यों नहीं मिले?
शुद्ध उपवास वह है जिसमें जल की कुछ मात्रा बढ़ाकर उस में नींबू डालकर पिया जाता है वह नै बन पड़े तो दूध जैसे द्रव्य पदार्थों से काम चलाना चाहिए वह भी न चले तो शाकाहार को उपवास माना जा सकता है पूरे दिन जिन्हें भूखा रहना कठिन हो वह भी एक समय शाम को तो जैसा हल्का भारी उपवास बन पड़े कर ही लें जिन्हें आवश्यकता प्रतीत हो वे उस दिन एनिमा भी ले सकते हैं ।पेट साफ करने का यह अपेक्षाकृत अधिक निरापद तरीका है ।पेट भारी होने पर आवश्यकतानुसार दस्त साफ करने के लिए ईसबगोल की भूसी सुनाय चूर्ण ,त्रिफला जैसे हल्के विरेचक भी कभी-कभी काम में लाए जा सकते है
(5) प्रातः जलपान में दूध, छाछ रस रसा जैसे पेय पदार्थ ही लेने चाहिए। भारी नाश्ता सिर्फ उन्हीं को करना चाहिए जिन्हें सवेरे से ही कड़ा शारीरिक श्रम करना पड़ता है रात्रि में शारीरिक श्रम न होने से पेट में प्राय बिना पचा भोजन पड़ा रहता है उसे हजम होने के लिए कुछ समय मिलना चाहिए दोपहर दोपहर के भोजन के बाद रात्रि को सोने से कम से कम 2 घंटे पूर्व भोजन करना चाहिए ।और वह भी हल्का होना चाहिए अन्यथा पेट भरा रहने से नींद में विक्षेप उत्पन्न होगा और अपच रहने लगेगा।
विहार: शारीरिक श्रम हर प्राणी के लिए नितांत आवश्यक है। इसके बिना सभी कल पुर्जे जकड़ जाते हैं और जंग लग जाती है ।आहार पचने और रक्त के दौड़ने में अड़चन पड़ती है नशे और पेशियां पिलपीली रहने लगती हैं दिमागी काम अधिक और कम श्रम करने वाले आदमी अस्वस्थ रहने लगते हैं। आलस में समय गंवाने वालों की भी यही दुर्गति होती है । आलस में समय बिताने वाले मधुमेह ,गैस ,सिर दर्द जकड़न गठिया जैसे अनेक रोगों के शिकार हो जाते हैं उनकी प्रजनन शक्ति भी नहीं रहती ।सृष्टि का हर प्राणी आहार खोजने आशियाना ढूंढने संकट से बचने तथा मनोविनोद के लिए भागता दौड़ता रहता है यही बलिष्ठा की कुंजी है । इसलिए शरीर को स्वस्थ रखने के लिए शारीरिक श्रम का कोई न कोई उपाय अवश्य अपनाना चाहिए।
मानसिक संतुलन: जो उपलब्ध है उससे प्रसन्न रहना और भविष्य के लिए अच्छी आशा एवं साहस भरी चेष्टा करना ही सुखी संतुष्ट रहने और सफल बनने का आधारभूत सिद्धांत है। प्रतिकूलता हर मनुष्य के जीवन में आती हैं इच्छित परिस्थिति किसी को भी प्राप्त नहीं होती ।कुछ न कुछ अभाव और असंतोष हर किसी को बना रहता है व्यवधान और अवरोध से रहित जीवन आज तक किसी ने भी नहीं जिया। कठिनाइयों के साथ जूझते प्रतिकूलताओ के साथ तालमेल बिठाते और जो अपरिहार्य है उसे धैर्य साहस पूर्वक सहने से ही काम चलता है। अधिक अच्छी स्थिति प्राप्त करने में प्रयत्नरत रह कर अपना पौरुष और गौरव बढ़ाना चाहिए। इतने पर भी यह आशा नहीं करनी चाहिए कि सभी इच्छित सफलताएं मिलकर ही रहेंगी या मिलनी ही चाहिए ऐसी अति महत्वाकांक्षी प्रायःपाए जाते हैं और जो उपलब्ध है उसका आनंद न ले सकने के कारण मानसिक दृष्टि से अस्वस्थ ही बने रहते हैं जिसने मानसिक आरोग्य खोया वह शरीर से भी निरोग न रह सकेगा।
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