शरीर की मूल प्रकृति बीमार होने की नहीं है ।सृष्टि के असंख्य प्राणियों को अपने-अपने ढंग के शरीर मिले हैं वह निर्धारित आयु तक बिना किसी व्यथा बीमारी के जीवित रहते हैं । मृत्यु दुर्घटना आदि अपने हाथ की बात तो नहीं पर बीमारी का उत्पादन अपना निजी है उसे अपनी रीति नीति बदलकर आसानी से रोका जा सकता है । स्वास्थ्य सुरक्षा की सर्वविदित नीति है कि प्रकृति के अनुरूप अपना आहार विहार रहन-सहन बनाए रखा जाए जैसा कि सृष्टि के सभी प्राणी बनाए रखते है और इंद्रियों का संयम बरता जाए श्रम और आराम का संतुलन रहे मस्तिष्क को उत्तेजना से बचाए रखा जाए स्वच्छता का ध्यान बना रहे तो इन मोटे नियमों का पालन भर करने से रोगों से बहुत हद तक छुटकारा मिल सकता है । सब उपार्जित बीमारियों का ही बाहुल्य रहता है बाहर से तो बहुत कम आती है मौसम का प्रभाव वंशगत विकास व दुर्घटना आदि कारणों से भी अप्रत्याशित रोग हो सकते हैं पर उनका अनुपात बहुत स्वल्प रहता है। उन्हें अपवाद भर समझा जा सकता है मूल उत्पत्ति तो अपने ही उच्चश्रृंखला से होती है। अव्यवस्थित और विकृत आदतो का शिकार होकर ही मनुष्य बीमार पड़ता है ।आमतौर से औषधीय उपचार ही रोग निवारण के लिए प्रयुक्त होता है पर ध्यान रखने योग्य बात यह है कि उसमें लाभ की मात्रा से कम हानि की मात्रा नहीं है
रोग का होना यह प्रकट करता है कि शरीर में विजातीय द्रव्य भर गया है और उसके विरूद्ध जीवनी शक्ति ने खुली लड़ाई आरंभ कर दी है साथ ही यह भी जानकारी मिलती है कि आहार-विहार में घुस पड़ी विकृतियां शरीर के ढांचे की तोड़फोड़ कर रही हैं। इस स्थिति के निराकरण के ऐसे सौम्य उपाय होने चाहिए जिससे जीवन शक्ति बढे और विषाणुओ को मिलने वाला परीपोषण बंद हो जाए। इसके लिए संचित मल निष्कासन एवं अवयवों को विश्राम देने वाले उपाय अपनाए जाने चाहिए । उस और अपेक्षा रखी जाए और रोग के ऊपरी लक्षण कष्ट को दबाया जाए तो इससे कुछ स्थाई समाधान न निकलेगा। बाढ़ का पानी मेड के एक रास्ते न सहि दूसरे रास्ते में निकलेगा। एक बीमारी अच्छी होते दूसरी अन्य व्याधियां उठ खड़ी होती हैं इससे प्रकट होता है कि मात्र ऊपर से ही लीपा पोती हुई है इसका अस्तित्व अपने स्थान पर यथावत मौजूद है।
मूल तथ्य यह समझा जाना चाहिए कि जीवनी शक्ति का आधार है _•शरीर का पूरी तरह स्वस्थ बने रहना व उसके सभी अंगो का अपना अपना कार्य सही ढंग से करते रहना ।ऐसा ना हो, शरीर आरामतलब होता चला जाए, तो जीवन संग्राम में लड़ने योग्य सामर्थ्य वह खो बैठते हैं ,छोटे-छोटे हिचकोले उसे झकझोर देते हैं। जन्म काल से ही बालक को प्रौढ़अवस्था तक पहुंचने में पहुंचने तक अनेकाअनेक अवांछनीय परिस्थितियों का सामना करना होता है। अंदर संचित जीवनी शक्ति वातावरण व मौसम के परिवर्तन जीवाणु विषाणु के हमले तथा अन्य प्रतिकूलताओ से जूझ सकने योग्य सामर्थ्य उसे देती है। इस जीवनी शक्ति का संचय सक्रिय बने रहकर ही संभव है। अकर्मण्यता तो इस प्रकार है जैसे हाथ पैर सही सलामत होने पर भी चलने के लिए मना कर देना ।जैसे लोहे को जंग व लकड़ी को घुन खा जाते हैं उसी प्रकार निष्क्रियता मानवीय सामर्थ्य को नष्ट कर देती है विजातीय द्रव्य मलो के संचय का द्वार खोल देती है ।रोग का आक्रमण अप्रत्यक्ष रूप से हो चुका होता है जो समय आने पर गंभीर रूप में फलित होता है। प्राकृतिक उपकरणों से स्वयं को वंचित कर मनुष्य किस प्रकार आत्महंता बनता व सतत रोगी होता रहता है बनता है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण जीवन में रोगियों की भीड़ अस्पतालों में घरों में देखकर अनुमान लगाया जा सकता है
तथ्य यह भी अपने स्थान पर सही है कि गत सौ दो सौ वर्षों के भीतर संसार में जो नए-नए आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन हुए हैं उनको देखते हुए अब प्रत्येक मनुष्य के लिए खेतों और खुले स्थानों में पर्याप्त शारीरिक श्रम करके जीविकोपार्जन करना संभव नहीं रह गया है ।अब बहुसंख्यक व्यक्तियों के लिए कल कारखानों और दफ्तरों में काम करना एक अनिवार्य आवश्यकता बन गया है ।इतना ही नहीं आज उत्तम खेती वाला प्राचीन सिद्धांत व्यवसाय में गलत माना जाने लगा है और दफ्तरों में कुर्सी पर बैठकर काम करने वाले बाबू या मशीन पर थोड़े परिश्रम से अधिक काम कर सकने वाले कारीगरों या कंप्यूटर पर काम करने वाले एक्सपर्ट्स को समाज में किसानों की अपेक्षा अधिक ऊंचा माना जाता है और सुख सुविधा भी अधिक प्राप्त होती है ।ऐसी दशा में गांव के रहने वाले भी जिनके बाप दादा सैकड़ों वर्षो से खेती अथवा अन्य ग्रामीण उद्योग धंधों से निर्वाह करते हुए समस्त जीवन बिताते रहते थे इस समय बराबर यह चेष्टा करते हैं कि किसी प्रकार कोई नौकरी प्राप्त करके शहरी जीवन व्यतीत करने का मौका पा सके। वर्तमान समय में व्यवस्थित जीवन चर्या ही रोगों का विशेष कारण है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें