आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में मनुष्य के जीवन में औषधि के साथ उसके आहार को बहुत महत्व दिया गया है। रोगी की चिकित्सा करने के लिए औषधि के साथ साथ उस को दिए जाने वाला आहार से संबंधित ज्ञान का होना अति आवश्यक माना जाता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक तत्वों का आहार में होना आवश्यक माना जाता है।
हमारे उपनिषदों में अन्न को ब्रह्म की संज्ञा दी गई है। आहार को युक्तिसंगत बनाकर और उसके विज्ञान को जानकर हम अनेकों व्याधियों की चिकित्सा कर सकते हैं। हम जो आहार सेवन करते हैं उसका प्रभाव केवल हमारे शरीर पर ही नहीं बल्कि हमारे मन पर भी पड़ता है। इसलिए कहा गया है कि "जैसा खाए अन्न वैसा होए मन" ।आहार से हमारे मन की प्रवृत्तियों का पोषण होता है और हमारी इंद्रियां पुष्ट होती है और हमारे प्राणों को बल मिलता है।
आयुर्वेद के अनुसार आहार हमें अपने शरीर की प्रकृति के अनुसार ग्रहण करना चाहिए । संतुलित आहार ही मनुष्य के स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहयोगी होता है। इस प्रकार पथ्य और उचित आहार लेने वाला व्यक्ति पहले तो रोगी ही नहीं होता ।यदि किसी कारणवश रोगी हो भी जाए तो परहेज पूर्वक भोजन से रोग बढ़ता नहीं और स्वास्थ्य ठीक हो जाता है ।इस प्रकार औषधि की आवश्यकता नहीं होती इसके विपरीत यदि मनुष्य अच्छी से अच्छी औषधि का सेवन तो करता है परंतु पथ्य नही करता तो भी रोग ठीक नहीं होता उसकी औषधि व्यर्थ हो जाती है। गलत आहार-विहार रोग बढ़ाने में कारण है और करण को दूर किए बिना रोग नष्ट नहीं हो सकता इसलिए आयुर्वेद में कहा गया है की परहेज करने वाला रोगी को औषधि की क्या आवश्यकता इलाज से परहेज अच्छा । अर्थात पथ्य अपथ्य सेवन का हमारे स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में इस बात पर बहुत ध्यान दिया जाता है कि रोगी को कौन सी औषधि के साथ कौन सा आहार दिया जाए ताकि रोगी को स्वस्थ किया जा सके। आयुर्वेद के अनुसार जिस प्रकार पथ्य हितकारी आहार के सेवन से स्वास्थ्य की रक्षा होती है और दोष अपनी सम अवस्था में बने रहते हैं उसी प्रकार अपथ्य अहितकारी आहार के सेवन से स्वास्थ्य का नाश और दोषों का प्रकोप होता है ।यह आहार भी अनेक प्रकार का हो सकता है कुछ खाद्य पदार्थ तो प्रकृति से ही दोषो का प्रकोप करने वाले रोग कारक होते हैं । परंतु कुछ प्राकृतिक रूप से और अकेले तो बहुत गुणकारी और स्वास्थ्यवर्धक होते हैं लेकिन जब इन्हीं पदार्थों को किसी अन्य खाद्य पदार्थ के साथ लिया जाए अथवा किसी विशेष समय रूप में या किसी विशेष वस्तु में पकाकर सेवन किया जाए तो यह लाभ के स्थान पर हानि पहुंचाते हैं ।और अनेक प्रकार के रोगों का कारण बनते हैं विरुद्ध आहार कहलाते हैं क्योंकि यह रस रक्त और आदि धातुओं को दूषित करते हैं दोस्तों को पर कुपित करते हैं तथा मलो को शरीर से बाहर नहीं निकालते ।अनेक बार कुछ गंभीर रोगों की उत्पत्ति का कोई साफ साफ कारण नहीं दिखाई नहीं देता ।वस्तुतः उनका कारण विरुद्ध आहार होता है क्योंकि आयुर्वेद में कहा है कि इस प्रकार के विरुद्ध आहार का निरंतर सेवन करते रहने से यह शरीर पर धीरे-धीरे दुष्प्रभाव डालते हैं और धातुओं को दूषित करते रहते हैं। अतः विरुद्ध आहार नाना रोगों का कारण बनता है और रोगी के शरीर में वात, पित्त, कफ का प्रकोप होने की वजह से रोग और बढ़ता चला जाता है ।इसलिए उपचार करते समय औषधि के साथ-साथ रोगी के आहार पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इस प्रकार के विरुद्ध आहार के सेवन से शरीर के धातु और दोस्त असंतुलित हो जाते हैं परिणाम स्वरूप अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं अतः इन सब का विचार करके ही खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए। संतुलित आहार ही आयुर्वेदिक उपचार में सहयोगी माना जाता है।
(2) दही के साथ जो खाद्य पदार्थ नहीं लेनी चाहिए वह ह --
गरम पदार्थ ,पनीर ,खीर ,दूध ,खीरा ,खरबूजा का सेवन नहीं करना चाहिए
(3) केला के साथ मट्ठा का सेवन स्वास्थ्य के विरुद्ध माना जाता है
(4) उड़द की दाल के साथ मूली का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है
विरुद्ध आहार के सेवन से मनुष्य के शरीर
की प्रकृति वात, पित्त ,कफ के असंतुलित होने से
रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए आहार का विचार करके ही सेवन करना चाहिए जो हमारे स्वास्थ्य के लिए हितकर है।
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