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आयुर्वेदिक शास्त्र के अनुसार षट्कर्म,षट्कर्म क्रियाएं क्या होती है,


                            षट्कर्म 


आयुर्वेद शास्त्र में शरीर को स्वस्थ रखने हेतु  जिस प्रकार औषधियों का सेवन कराया जाता है उसके साथ साथ आहार-विहार शारीरिक व्यायाम आदि पर भी जोर दिया जाता है। रोग उपचार  के लिए 'षट्कर्म',  क्रियाओं के द्वारा शरीर शोधन की क्रियाओं के अभ्यास भी किए जाते हैं ।परंतु इन क्रियाओं को किसी योग्य गुरु के संरक्षण में किया जाना चाहिए।  षट्कर्म का मुख्य उद्देश्य शरीर की बल और स्थिति को ध्यान में रखते हुए शरीर को शोधन करना अर्थात शरीर का शुद्धिकरण करना होता है।  । षट्कर्म की क्रियाएं स्थूल शरीर को शुद्ध करती हुई सूक्ष्म शरीर के शुद्धिकरण में अत्यंत सहायक हैं ।इन क्रियाओं के अभ्यास से कफज विकार, वातज विकार ,पितज विकार अर्थात त्रिदोष वात पित्त कफ की विषम अवस्था को सम अवस्था में लाया जाता है। कुष्ठ रोग, उदर रोग, फुफ्फुस विकार हृदय एवं वृक्क की विकृतियां दूर होती हैं। यह षट्कर्म क्रियाएं छः प्रकार की होती है जो इस प्रकार हैं --

(1) नेति :--  इस क्रिया का प्रयोग मुख्यतः नासा मार्ग के शोधन हेतु किया जाता है। यद्यपि इस नेती क्रिया को नासा मार्ग से किया जाता है परंतु इसका असर हमारे मस्तिष्क आंख कान आदि पर भी  पड़ता है।   नेति क्रिया मुख्यतः तीन प्रकार से की जा सकती है ---

• जलनेति ---- इस क्रिया को करने के लिए पतली नली वाला एक लोटा ले और उस लोटे में सेंधा नमक मिला हुआ थोड़ा गुनगुना पानी भर ले । पहले लोटे की नली को अपने नथुने से सटाए। अब बाएं नथुने से लौटे की नलिका के द्वारा पानी को अंदर की तरफ डालें और अपने सिर को थोड़ा सा दाई और झुका ले। तत्पश्चात अपने मुंह से सांस लें और पानी को नासिका में धीरे-धीरे जाने दे। इस प्रकार आपकी बाईं नासिका से लिया  हुआ जल धीरे-धीरे दाई नासिका से निकलना आरंभ हो जाएगा। अब ठीक इसी प्रकार दाएं नासिका से लोटे की नली द्वारा जल ग्रहण करते हुए बाएं नासिका से जल को बाहर निकाले। इसमें ध्यान देने योग्य बात यह है कि यदि आपकी नासिका शुष्क है तो नेति करने से पहले नासिका में थोड़ा घी लगा लें । यह प्रक्रिया आप कुछ मिनटों तक अपनी स्थिति के अनुसार दोहरा सकते हैं।
• सूत्रनेति -----  इस क्रिया को करने से पहले अपने ना नासिक  में थोड़ा घी लगा ले ताकि यदि आपकी नासिका शुष्क है तो वह थोड़ी नरम हो जाएं और नेति करते समय आपको किसी प्रकार की परेशानी का सामना ना करना पड़े। इसको करने के लिए आप एक इतना मोटा सूती धागा ले जो आपकी नासिका में आराम से अंदर घुस जाए जिसकी लंबाई लगभग डेढ़ फुट हो । इस धागे को थोड़ी देर के लिए गुनगुने पानी में भिगो दें ताकि है थोड़ा और ज्यादा नरम हो जाए। अब धीरे-धीरे इस नेति को अपनी नासिका में घुसाए और अपने मुंह से बाहर निकाले  फिर नेति को धीरे धीरे अंदर बाहर  खींचे कुछ समय आप इस क्रिया को दोहराते रहें। यद्यपि आजकल आधुनिक युग में सूती धागे की जगह रबड़ की नेति भी आती है  जिसके द्वारा भी ये क्रिया की जा सकती है।
• धृत नेति -----  इस क्रिया में गाय के घी की आवश्यकता होती है। यदि गाय का घी ना हो तो भैंस के घी से भी काम चल सकता है। यद्यपि इस क्रिया में गाय का घी उत्तम माना गया है। एक चम्मच गाय का घी लेकर उसे थोड़ा गुनगुना कर ले तत्पश्चात पीठ के बल लेट कर अपने सिर को थोड़ा ऊपर उठाकर  पहले दाएं नासिका में घी को डालें और फिर इसी प्रकार बाईं नासिका में भी डालें । नासिका में घी डालते समय नाक से धीरे-धीरे सांस अंदर की तरफ खींचें ताकि घी अंदर की तरफ जाता रहे। कुछ देर तक पीठ के बल ही लेटे रहे और नाक से धीरे-धीरे सांस अंदर की तरफ खींचते रहे।
नेति क्रिया के लाभ :-- नेती क्रिया को विधिपूर्वक करने से हमें विभिन्न प्रकार की स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होते हैं।
(1)जल नेती ,सूत्र नेती और घृत नेति से हमारे नाक, कान, और आंख के सभी रोगों का उन्मूलन होता है ,
(2)स्मरण शक्ति बढ़ती है, आंखों की रोशनी बढ़ती है । यदि आंखों पर चश्मा लगा हुआ हो तो बहुत जल्द चश्मा भी हट जाता है।
(3)कान के रोगो का निदान होता है
(4) नजला, जुखाम खांसी जैसे पुराने रोगों में भी लाभ मिलता है।
(5)मिर्गी जैसे रोग में भी नेति करने से लाभ प्राप्त किया जा सकता है।



धोती क्रिया  :-- षट्कर्म में धोती क्रिया का शरीर-शोधन के  लिए प्रयोग किया जाता है । धौति का अर्थ होता है - धोना, यह क्रिया षट्कर्म का एक अंग है। यह षट्कर्म कर्मों में से  महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। वस्त्रधौती, दंडधौती तथा कुंजरक्रिया  का वर्णन इस प्रकार है।

वस्त्रधौति :--- यह एक शारीर शोधन क्रिया है, इस क्रिया में वस्त्र अर्थात कपड़े का प्रयोग किया जाता है। इस विधि में सही मायने में पेट और भोजन की नली को कपड़े के द्वारा साफ किया जाता है। इस क्रिया को करने के लिए लगभग चार पांच सेंटीमीटर चौड़ी और 5 मीटर लंबी सूती कपड़े की एक पट्टी ले उसे 5 मिनट तक गर्म पानी में उबालें और उसे साफ पानी से अच्छे से धो लें फिर उसे निचोड़ कर सुखा ले । तत्पश्चात उस कपड़े को गिला करे। काग आसन (ऊकडू)पर बैठकर  कपड़े को जीभा पर रखकर धीरे-धीरे निगलना आरंभ करें । कपड़ा निगलते समय यदि कोई परेशानी होती है तो बीच में थोड़ा बहुत पानी  भी ले सकते हैं। परंतु ध्यान रहे अधिक पानी नहीं लेना है अन्यथा  वमन  होने का  डर रहता है ।  दो तिहाई कपड़ा निगल ले और बाकी मुंह से बाहर रहने दे। अब खड़े हो जाएं और थोड़ा झुक कर नौली क्रिया करें अर्थात पेट को थोड़ा घूमाए जिससे पेट में गया हुआ कपड़ा मथा जाए। अब कपड़े को धीरे-धीरे बाहर खींचे ।यदि खींचते समय कोई कठिनाई महसूस होती है तो थोड़ा पानी पी ले फिर थोड़ा कपड़े को अंदर सटके उसके पश्चात फिर कपड़े को धीरे-धीरे बाहर निकाले इस प्रकार कपड़ा आसानी से बाहर आ जाएगा।
दंडधौती :--- इस शोधन क्रिया को करने के लिए केला के मृदु भाग की एक दंड का प्रयोग किया जाता है । इसलिए इसका नाम दंडधौती रखा गया है । यद्यपि आधुनिक समय में इस  क्रिया को करने के लिए प्लास्टिक पाइप आदि का प्रयोग किया जाता है। 12 से 15 इंच लंबा और लगभग 1/8 इंच मोटा पाइप ले और उसे गर्म पानी में उबाल ले। दिन प्रतिदिन धीरे-धीरे अभ्यास करते हुए पाइप को धीरे-धीरे मुंह के रास्ते अंदर डालें। इस अभ्यास में आपको कई दिन लग सकते हैं जल्दबाजी न करें ।पहले दिन थोड़ा करें दूसरे दिन  पाइप को और ज्यादा अंदर करें और फिर इसके द्वारा अंदर पानी पिए जितना पी सकते हैं एक लीटर या डेढ लीटर तत्पश्चात खड़े होकर थोड़ा आगे की ओर झुक कर पानी को धीरे-धीरे बाहर निकाले। आप देखेंगे कि धीरे-धीरे अभ्यास से पानी आसानी से बाहर निकल जाता है और आपके पेट का शुद्धिकरण हो जाता है।
कुंजरक्रिया ( वमन धौति ) :----  षट्कर्म की यह क्रिया सही मायने में पानी के द्वारा पेट को साफ करना है। इस क्रिया को करने के लिए लगभग 1 से 2 लीटर पानी उबालकर ठंडा कर लें और एक जग में भर कर  उसमें थोड़ा नमक मिला लें। तत्पश्चात पानी को कपड़े से छान लें। अब काग आसन पर बैठकर पानी को जब तक पिए तब तक आप पी सकते हैं। अब खड़े होकर थोड़ा आगे झुके और अपने हाथों की उंगलियों को मुंह में डालकर वमन अर्थात उल्टी करने की कोशिश करे। इसमें ध्यान रहे कि  आपके हाथों की उंगलियों के नाखून बड़े ना हो और मुंह में डालने से पहले हाथों को गर्म पानी से साफ कर लें ।इस प्रकार वमन करने से पानी बाहर आ जाएगा और आपके पेट में जमा विषाक्त पदार्थ, एसिड आदि बाहर निकल जाएंगे और आपके पेट का शुद्धिकरण होगा । जो अभ्यार्थी दंडधौती या वस्त्रधौती नहीं कर पाते उनके लिए कुंजरक्रिया करना आसान होता है।
धोती क्रिया के लाभ -- (1) इस क्रिया के द्वारा शरीर से अवशिष्ट पदार्थ बाहर आते हैं और शरीर स्वस्थ होता है।
(2) वात पित्त कफ त्रिदोष को संतुलित करता है
(3)  दमा के रोग में बहुत लाभकारी है।
(4) खांसी और कफ के रोगों को शांत करता है।
(5) पाचन क्रिया को मजबूत करता है और शरीर को शक्तिशाली बनाता है।
(6) शरीर में जमा अतिरिक्त चर्बी को कम कर के वजन को कम करता है।

शंखप्रक्षालन :--- षट्कर्म में यह क्रिया आंतों को साफ करने के लिए की जाती है। जैसा की नाम से ही प्रतीत होता है, शंख का अर्थ यहां पर आंतो से लिया गया है और प्रक्षालन का अर्थ धोना होता है अर्थात आंतो का धोना ही शंखप्रक्षालन है। इस क्रिया को करने के लिए आपको खाली पेट होना आवश्यक है। आप लगभग 2 लीटर पानी को उबालकर ठंडा कर ले और उसे कपड़े से छानकर थोड़ा नमक मिला लें। अब  इस पानी को जितना पी सकते हैं उतना पिए । पानी पीने के तुरंत बाद  कटिचक्रासन ,सर्पआसन, हस्तेत्तासन या उदराकर्षणासन करे। यह आसन करने के थोड़ी देर में आपको शौच जाने की इच्छा होगी।  पहली बार शौच में थोड़ा  कठोर मल आएगा दूसरी  बार थोड़ा पतला और तीसरी बार पानी की तरह पतला मल बाहर आएगा। इस प्रकार आप कई बार पानी पीकर कई बार आसन कर इस क्रिया को दोहराएं ऐसा करने से आपकी आंतो में जमा सारा मल शौच  के द्वारा बाहर आ जाएगा और आपके आंतो का शुद्धीकरण होगा। ऐसा करने से शरीर में थोड़ी थकावट या कमजोरी महसूस कर सकते हैं, परंतु इससे घबराए ना। इसके बाद आप गर्म पानी से स्नान करके 1 घंटे के अंदर अंदर कुछ आवश्यकता अनुसार भोजन ग्रहण जरूर करें।

लाभ ---(1)  आंतों की शुद्धि होकर  शरीर में स्फूर्ति का संचालन होता है।
(2)  इस क्रिया से आंतों में जमा विषैले तत्व बाहर निकलकर आंतों का शुद्धिकरण होता है ।और आंतों की कार्यक्षमता बढ़ती है जिससे शरीर स्वस्थ होता है।
(3) पेट की गैस ,कब्ज ,अपच व अम्लता आदि रोगों में लाभ होता है।
(4)  गुर्दे की पथरी और मूत्र संबंधी रोगों का निदान होता है
(5) पाचन क्रिया मजबूत होती है और शरीर की कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है।

बस्ति :---- षट्कर्म की यह क्रिया बड़ी आंत के निचले भाग को शुद्ध करने के लिए प्रयोग की जाती है। हालांकि इस क्रिया को करने में लोग थोड़ा संकोच करते हैं और इसे एक जटिल प्रक्रिया समझते हैं यद्यपि ऐसा नहीं है। शास्त्रों में बस्ति क्रिया दो प्रकार की बताई गई है पहली जलबस्ति तथा दूसरी पवनबस्ति। जल बस्ती में जल का प्रयोग किया जाता है तथा पवन बस्ती में पवन का प्रयोग किया जाता है।


जलबस्ति ---  इस क्रिया को सुबह खाली पेट करने का समय उत्तम माना गया है। इस प्रयोग को करने से पहले साधक इस बात का विशेष ध्यान रखें कि वह किसी प्रकार से आंतों के रोग से ग्रसित ने हो । इस प्रयोग को साधक किसी तालाब अथवा अपने घर में पानी के टब में भी कर सकता है।    इस विधि  मे  पानी में बैठकर उड्यान बंध लगाकर गुदा मार्ग द्वारा पानी को ऊपर की ओर खींचा जाता है। इससे पानी बड़ी आत के निचले हिस्से में भर जाता है और उसके पश्चात उस पानी को गुदा मार्ग से ही बाहर निकाल दिया जाता है। इस प्रकार बड़ी आत के निचले हिस्से का शुद्धीकरण हो जाता है
पवनबस्ति ---- षट्कर्म क्रिया में जल बस्ती की तरह पवन बस्ती भी होती है जिस प्रकार जल बस्ती में जल का प्रयोग किया जाता है उसी प्रकार पवन बस्ती में पवन का प्रयोग किया जाता है । पवन बस्ती का मुख्य प्रयोजन पवन के द्वारा बड़ी आत के निचले हिस्से को साफ करना होता है। इस प्रयोग में पश्चिमोत्तानासन में बैठकर गुदा मार्ग द्वारा पवन को धीरे धीरे अंदर की तरफ खींचा जाता है और बार-बार अश्वनी मुद्रा का प्रयोग कर बड़ी आत में पवन को भरा जाता है। फिर धीरे-धीरे उस पवन को गुदा मार्ग द्वारा बाहर निकाल  दिया जाता है। इस प्रकार बार-बार इस प्रयोग को करके पवन को गुदा मार्ग से अंदर खींचकर और उसे बाहर निकाल कर बड़ी आंत के निचले हिस्से का शुद्धिकरण किया जाता है।
 लाभ --- (1) इस क्रिया से आंत  का शुद्धीकरण होकर शरीर में बल व स्फूर्ति का संचार होता है।
(2)  कब्ज  गैस वात के अन्य रोगों का निदान होता है।
(3) पेट नरम रहता है और पाचन क्रिया मजबूत होती है।
(4) वात पित्त कफ के दोषों को दूर कर शरीर को  स्वास्थ्य प्रदान होता है।
(5) पेट के अफारा में  लाभ मिलता है।


 त्राटक :---- इस क्रिया का प्रयोग नेत्रों के द्वारा नेत्रगत मल एवं प्रकुपित कफ  के शोधन हेतु किया जाता है। यह नेत्रों की मांसपेशियों द्वारा किया जाने वाला एक अभ्यास है। इस अभ्यास को करने के लिए लगभग 3 से 4 फुट की दूरी पर किसी चित्र को केंद्र बिंदु बनाकर उसपर लगातार टकटकी बांधे हुए देखना है। इस विधि को करते समय शरीर को विश्राम की स्थिति में रखते हुए विचारों को शांत रखना है। सबसे पहले तीन से 4 फुट की दूरी पर केंद्र बिंदु स्थापित करने के लिए  कोई दीपक, मोमबत्ती या अपने इष्ट ,भगवान ,महापुरुष आदि की तस्वीर या कोई गोलाकार वस्तु को रखें।अन्यथा चंद्रमा अथवा उगते हुए सूर्य का भी प्रयोग किया जा सकता है। इस प्रकार अपने केंद्र बिंदु को टकटकी बांधकर बिना पलक झपके  जितनी देर देख सकते हो देखें। इस अभ्यास को यथाशक्ति कई बार करे । ऐसा करने से आपका मन शांत होने लगेगा विचार शून्यता की स्थिति बढ़ने लगेगी ।
लाभ  ----(1) इस  क्रिया से हमारा मन शांत होता है।
(2) एकाग्रता बढ़ाने में इस क्रिया का प्रयोग किया जाता है।
(3) इस विधि से विचारों को शांत कर ध्यान में उतरा जा सकता है
(4)  मन बड़ा चंचल होता है, इस विधि से मन को काबू में किया जा सकता है।
(5) इस अभ्यास को करने से हमारे नेत्रों की मांसपेशियां मजबूत होती है और आंखों की रोशनी बढ़ती है।

नौली  क्रिया :---  षट्कर्म में नौली क्रिया बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस क्रिया में शरीर की एक विशेष मुद्रा बनाकर पेट की मांसपेशियों को मथा जाता है। इस अभ्यास को करने के लिए सुबह खाली पेट  का समय उत्तम माना जाता है। इस क्रिया को करने के लिए सबसे पहले खड़े हो जाएं और थोड़ा आगे की ओर झुके इसके पश्चात अपना पूरा श्वास बाहर निकाल दें । हाथों को अपने दोनों जांघो पर रखकर धीरे धीरे पेट की मांसपेशियों को घुमाने की चेष्टा करें । यह अभ्यास का विषय है, जब आप बार-बार अभ्यास करेंगे तो आपकी पेट की मांसपेशियां हिलने लगेंगी और नौली क्रिया होने लगेगी। इस क्रिया को करने से पहले यदि किसी योग्य गुरु का सानिध्य प्राप्त कर लें तो उत्तम होगा ।इस अभ्यास को करने से पहले इस बात का ध्यान रखें कि पेट में घाव या अलसर जैसा कोई रोग ना हो।
लाभ -- (1) इस क्रिया को करने से हमारी आंत मजबूत होती है।
(2) मंदाकिनी का रोग दूर होता है और भूख अच्छी लगती है।
(3)  उदर विकार नष्ट होते हैं।
(4) कब्ज, गैस, एसिडिटी जैसे रोग दूर होते हैं।
(5) वात ,पित्त ,कफ त्रिदोष का निदान होता है।












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