योग,Yoga योग भारतीय दर्शनशास्त्र की एक अत्यंत प्राचीन विद्या है। भारतीय प्राचीन ग्रंथ वेद शास्त्रों में भी योग का व्यापक रूप से वर्णन मिलता है। षट्दर्शन में योग दर्शन ही एक ऐसा दर्शन है जो मानव जीवन में अध्यात्म वाद-विवाद या तर्कशास्त्र को महत्व न देते हुए जीवन के उत्थान के लिए मानव स्वास्थ्य एवं उसके शरीर के व्यवहारिक प्रयोगात्मक पक्ष पर विशेष बल देता है। यही कारण है कि इस दर्शन में आसन, योग प्रक्रिया, प्राणायाम, व्यायाम आदि के माध्यम से शारीरिक स्वास्थ्य एवं आध्यात्मिक उपलब्धि पाने की बात दर्शाई गई है। इसी विशेषता के कारण प्राचीन काल से लेकर आज तक योग अपनी उपयोगिता बनाए हुए हैं। आज आधुनिक युग में देश काल की सीमाओं को लांघकर योग अब योगा बनकर विदेशों में भी खूब प्रचलित हुआ है। योग जीवन को संपूर्ण रूप से देखने की दृष्टि देता है। इसमें शरीर को साधन मानकर उसे सशक्त बनाने पर जोर दिया गया है। स्वस्थ शरीर के बिना साधना नहीं होती इसलिए शास्त्रों में कहा जाता है " शरीरमाद्यं खल...